बाल विकास की चुनौतियां

मुद्रण

विगत कुछ दशकों में स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी प्रयत्‍नों में चार बातों पर अधिक बल दिये जाने के कारण भारत के स्‍वास्‍थ्‍य परिदृश्‍य में परिवर्तन आया है। ये हैं – विकास कार्यों की जांच, स्‍तनपान को प्रोत्‍साहन, मौखिक पुनर्जलीकरण एवं टीकाकरण। देश में शिक्षा के सुधरते स्‍तर से जनस्‍वास्‍थ्‍य में सुधार दिखाई पड़ रहा है। उदाहरण के लिए केरल में साक्षरता वृ‍द्धि‍ से वहां के जन-स्‍वास्‍थ्‍य के स्‍तर में भी वृद्धि‍ देखी गयी है।

सामाजिक मूल्‍यों में परिवर्तन/अथवा ह्रास –
आज अधिकांश परिवारों का झुकाव भौतिक साधनों की ओर है। टी.वी.; वीडियो एवं म्‍युज़ि‍क सिस्‍टम, क्‍लबों एवं पार्टियों के कारण बच्‍चे उपेक्षित रह जाते हैं। माता-पिता उन पर ध्‍यान नहीं देते। आज परिवारों में परस्‍पर सम्‍बंध एवं वार्तालाप का अभाव है।

मूल्‍यों में ह्रास का दूसरा उदाहरण है सफलता को धन के उपार्जन के पैमाने में नापना। दौलत पाने की अंधी दौड़ से परिवार दुष्‍प्रभावित हो रहे हैं। इस प्रकार की पारिवारिक अव्‍यवस्‍था के कारण ये प्रभावित बच्‍चे, स्‍कूल में भी सबके साथ सामंजस्‍य, नहीं बिठा पाते और न ही शिक्षा के प्रति उनमें कोई रूचि रह जाती है।

सामाजिक मूल्‍यों में तीसरा ह्रास है, लोगों का अकेला पड़ना। आज हममें से बहुत कम लोग अपने पड़ोसियों से सम्‍बन्‍ध रखते हैं। बच्‍चों को भी अपने पड़ोस में मित्र नहीं मिलते। इसीलिए वे फिल्‍मी कलाकारों एवं खिला‍ड़ि‍यों को अपना नायक या आदर्श मान बैठते हैं।

मौजूदा नैतिक संकट मूल्‍य ह्रास का अभिन्‍न उदाहरण है। शहरी क्षेत्रों के 40% विद्यार्थी शराब के आदी है। उनमें से 30% तो ड्रग एवं नशीली दवाओं के व्‍यसनी पाए गए है।

परिवर्तनों के इस क्रम में पारिवारिक ढॉचे में परिवर्तन उल्‍लेखनीय है। विगत 20 वर्षो से संयुक्‍त परिवार टूटे हैं और तलाक शुदा अथवा अलग-अलग रहकर बच्‍चे पालने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

बच्‍चों के असुरक्षित समूह –
मूल्‍यों में तेज़ी से हो रहे इस ह्रास अथवा परिवर्तन के कारण बच्‍चों के असुरक्षित समूह बढ़ रहे हैं और ये समूह प्रायः सभी आयु वर्गो में विद्यमान है।

स्‍कूल जाने के पूर्व की अवस्‍था के बच्‍चे – दिनों दिन आसमान छूती मंहगाई के कारण पति एवं पत्‍नी दोनों को नौकरी करने पर विवश होना पड़ता है। इसका तत्‍काल असर नवजात शिशुओं तथा छोटे बच्‍चों पर पड़ता है। यहां तक कि 6-12 सप्‍ताह के बच्‍चे भी दूसरों की देख-रेख में छोड़ दिये जाते है। एक रिसर्च में निष्‍कर्ष निकाला गया है कि सभी शिशुओं को माता के दीर्घ एवं स्‍थायी साथ की आवश्‍यकता होती है ताकि उनमें अपनापन एवं लगाव की भावना विकसित हो सके। ‘‘मातृ शिशु-बन्‍धु’’ आरम्‍भ होने के पूर्व ही मॉ के काम पर लौट जाने के कारण बच्‍चों के अन्‍दर असुरक्षा की भावना पनपने लगती है। वह सोचने लगता है कि मुझे कोई नहीं चाहता। मेरी किसी को ज़रूरत ही नहीं है। मेरी चिन्‍ता कोई नहीं करता। इससे स्‍कूल जाने की पूर्वावस्‍था एवं स्‍कूल जाने योग्‍य बच्‍चों में ध्‍यान-हीनता, व्‍यवहार-विचलन एवं मंद बुद्धि‍ता जैसी समस्‍याएं उत्‍पन्‍न होती है।

लड़कियां (बालिकाएं) – आज भी लड़कियों की घोर उपेक्षा की जाती है। उन्‍हें हाशिये पर रखा जाता है, दरकिनार किया जाता है। यह प्रक्रिया जन्‍म के बहुत पहले से ही शुरू हो जाती है अर्थात् अल्‍ट्रा साउण्‍ड विधि-द्वारा गर्भस्‍थ भ्रूण के लड़का या लड़की होने का पता लगाकर लड़कियों के भ्रूण को गर्भपात द्वारा नष्‍ट कर दिया जाता है। जन्‍म लेने के बाद भी यह उपेक्षा जारी रहती है। अधिकांश बालिकाएं कुपोषण की शिकार हो जाती हैं, क्‍योंकि परिवार के भोजन स्रोत में बालिका के हिस्‍से से उन्‍हें वंचित रखा जाना आज समाज की परम्‍परा बन गयी है। एक तो भोजन की कमी है ही, दूसरी ओर लड़कियों के साथ शारीरिक दुर्व्‍यवहार भी किया जाता है। केवल लड़की ही है जिसे जबरन घरेलू कार्य करना तथा मीलों दूर से पानी के भारी घड़े उठाने, पशुओं के लिए चारा लाना एवं उनकी देखभाल इत्‍यादि करना पड़ता है।

तरूण या किशोर – आज के तरूण या किशोर जड़ विहीन एवं आदर्श भूमिका विहीन संस्‍कृति में विकसित हो रहे हैं। माता-पिता सुदृढ़ नैतिक मूल्‍यों के रखवाले नहीं रह गए हैं। बच्‍चे माता-पिता में दोगलापन देखते हैं, अतः उनका सम्‍मान नहीं करते। सही मार्गदर्शन करने वाले तत्‍वों के अभाव में आज तरूण ऐसी जीवन-शैली अपना बैठे हैं, जो उन्‍हें विनाश एवं पतन के गर्त में ढकेल देगी।

ज़रूरतमंद बच्‍चे/ अभावग्रस्‍त बच्‍चे – इनमें शामिल हैं, गली-कूचों में भटकने वाले बच्‍चे, बाल-श्रमिक, स्‍कूल-त्‍यागे हुए बच्‍चे, आदिवासी बच्‍चे एवं गरीबी के शिकार बच्‍चे, परन्‍तु इन सबसे कहीं अधिक असुरक्षित हैं विशेष ज़रूरत मंद बच्‍चे, अर्थात् मानसिक अथवा शारीरिक विकलांग बच्‍चे। हम एक ऐसे युग को ला रहे हैं जहां बचावकारी उपायों के कारण बच्‍चों की रूग्‍णावस्‍था में कमी आएगी, इसके बावजूद भी करोड़ों बच्‍चे विभिन्‍न निर्बलताओं के शिकार होंगे।

मसीही दृष्टिकोण – पौलुस 1कुरिन्थियों 1:27 में लिखता है, ‘‘परमेश्‍वर ने संसार के मूर्खों को चुन लिया है कि ज्ञानवानों को लज्जित करे, और निर्बलों को चुन लिया है कि बलवानों को लज्जित करें’’। यहां पर ऐसे बच्‍चे हैं जो हमें अत्‍यन्‍त मूर्ख, भंगुर एवं निर्बल जान पड़ते हैं। शरीर में टूटे हुय, देखने-सुनने अथवा बोलने में असमर्थ। किन्‍तु इन समस्‍त अक्षमताओं के बावजूद भी वे अपने में उल्‍लेखनीय योग्‍यताएं रखते हैं। ऐसे बच्‍चों के माता-पिताओं का कहना है कि उनके बच्‍चों की किसी विशेष आवश्‍यकता के फलस्‍वरूप ही उन्‍हें परमेश्‍वर की उत्‍तमता की अनुभूति हुई। उनके बच्‍चों की समस्‍याओं के कारण वे नए व्‍यक्ति बन सके और उनके पारिवारिक जीवन को नया आयाम मिला। ये बच्‍चे उन्‍हें विशेष ज़रूरतों की याद तो दिलाते ही हैं साथ ही साथ उनसे सामंजस्‍य स्‍थापित करने की अनुभूति पैदा करते हैं। यह संदेश केवल विशेष ज़रूरतमंद बच्‍चों के द्वारा ही सम्‍प्रेषित हो सकता है।

रूपान्‍तरण इस रूपान्‍तरण के तत्‍व क्‍या हैं? प्रथम – स्‍वास्‍थ्‍य की देखभाल से सम्‍पूर्ण स्‍वस्‍थता की ओर रूपान्‍तरण।
सम्‍पूर्ण स्‍वस्‍थता के अन्‍तर्निहित है, व्‍यक्ति का आंतरिक आयाम। आंतरिकता व्‍यक्तित्‍व की ओर इंगित करती है। यह उस व्‍यक्ति की ओर संकेत करती है जो अपने अन्‍दर एवं बाहर से वास्‍तविकता के सम्‍पर्क में है। यीशु ने कहा ‘‘मैं आया हूं कि तुम्‍हें जीवन मिले और बहुतायत से मिले’’।

यह वही बहुतायत है जिसका प्रतिनिधित्‍व सम्‍पूर्ण स्‍वस्‍थता करती है।

द्वितीय – विकासशीलता से आकार पाने की ओर रूपान्‍तरण।

आकार ग्रहण करने में निहित है, प्रत्‍येक बच्‍चे में परखने एवं चुनने की योग्‍यता का विकास। यह जानना कि इस बच्‍चे में क्‍या-क्‍या योग्‍यताएं छुपी हुई हैं एवं उनमें उन सारी बातों को डालना अथवा निवेश करना, जो उन्‍हें आगे चलकर सार्थक जीवन व्‍यतीत करने में सहायक सिद्ध हो सके। यह अवधारणा भजन संहिता 139 में पायी जाने वाली परमेश्‍वर द्वारा निर्धारित बच्‍चे की नियति को स्‍पष्‍ट करती है। ऐसा करने के लिए हमें अपने बच्‍चों के साथ समय व्‍यतीत कर उनके वरदानों, उनकी योग्‍यताओं, विचार प्रक्रियाओं, स्‍वप्‍नों एवं आकांक्षाओं का पता लगाना होगा।

तृतीय – मूल्‍यों पर आधारित व्‍यवस्‍था से आत्मिकता की ओर रूपान्‍तरण।

मूल्‍यों पर आधारित व्‍यवस्‍था मानवीय व्‍यवस्‍था का नमूना प्रदर्शित करती है। नैतिकता एक बहु प्रचलित आम शब्‍द है। विभिन्‍न संस्‍कृतियों एवं दशाओं में नैतिकता के विभिन्‍न अर्थ होते हैं। अतः नैतिकता पर बहस करना व्‍यर्थ है। हमें उसकी अपेक्षा व्‍यक्तिगत आत्मिकता की ओर बढ़ना होगा।

व्‍यक्तिगत आत्मिकता परमेश्‍वर के व्‍यक्तिगत ज्ञान से निर्मित होती है। मसीही होने के नाते यह यीशु के साथ गहरे आत्‍मीय सम्‍बंधों के फलस्‍वरूप उभरती है। यह यीशु के प्रति व्‍यक्ति के अभी न बंटने और टूटने वाले समर्पण एवं भक्ति को प्रतिबिम्बित करती है।

व्‍यक्तिगत आत्मिकता शिष्‍यता में पनपती है। यदि हमें अपने बच्‍चों में व्‍यक्तिगत आत्मिकता को उनकी जीवनचर्या बनाना है तो उन्‍हें शिष्‍य के रूप में निर्मित करना होगा। मसीह में विश्‍वास करना मात्र पर्याप्‍त नहीं है, हमें उन्‍हें मसीह की सच्‍ची शिष्‍यता एवं परिपक्‍वता में प्रगति करते हुए देखने की आवश्‍यकता है।

अगामी कदम
वे जो बाल-विकास के कार्यो में संलग्‍न हैं, उन्‍हें अपने कार्य में व्‍यस्‍त होने से बढ़कर कार्य में लीन होना है। कार्य आत्‍म-त्‍याग की मांग करता है। इससे कार्य विशिष्‍ट हो जाता है, अनुपम हो जाता है। क्‍या हमारी जीवन शैली इसलिए बदल गयी है क्‍योंकि हम बच्‍चों के साथ कार्य करते हैं? क्‍या हम अधिक विनम्र बन गए हैं? यदि हम आत्‍म-त्‍यागी बनने में इच्‍छुक नहीं हुए हैं तो हमारे भले कार्य परमेश्‍वर के सम्‍मुख मैले चीथड़े के समान होंगे। यदि हम यीशु की सेवा के तरीके पर विश्‍वास करते हैं तो केवल एक ही मार्ग है ‘‘परमेश्‍वर बढ़े और मैं घटूं’’ यही वह सद्गुण है, जिससे हमारी सेवाओं को चलाना है। यही वह सद्गुण है जो हमें बच्‍चों की पर‍वरशि करने एवं बाल-विकास कार्यक्रमों को संवर्धित करने हेतु प्रोत्‍साहित करता है।

संकलित – एम.पी. सोना