पहली विश्‍वास योग्‍य बात – परमेश्‍वर

मुद्रण

सबसे मुख्‍य हमें प्रभु यीशु पर विश्‍वास करना परन्‍तु इससे पहले हमें परमेश्‍वर पर विश्‍वास करना है। जब तक हम परमेश्‍वर पिता पर विश्‍वास नहीं करते तो हम उसके पुत्र यीशु मसीह पर क्‍यों कर विश्‍वास करेंगे? यीशु संसार में इसलिये आया कि वह हमें परमेश्‍वर से मिलाए परन्‍तु यदि कोई परमेश्‍वर है ही नहीं तो यीशु के जीने-मरने का कोई अभिप्राय नहीं, इसलिये ‘‘अक़ीदा’’ में सबसे पहले परमेश्‍वर पर विश्‍वास माना जाता है, ‘‘मैं इतिक़ाद रखता हूं खुदा क़ादिर ए मुतलक बाप पर जिसने आसमान और ज़मीन को पैदा किया’’ अथवा‘‘हर एक परमेश्‍वर सर्वशक्तिमान पिता पर विश्‍वास करते हैं। वह स्‍वर्ग और पृथ्‍वी का और समस्‍त दृश्‍य एवम् अदृश्‍य वस्‍तुओं का कर्ता है’’ ऐसे विश्‍वास पत्र सी.एन.आई. तथा मेथोडिस्‍ट की किताबों में पाए जाते हैं और हैं सही-सही। और अधिक लम्‍बी तौर से परमेश्‍वर की निसबत हमारा विश्‍वास है कि  ‘‘वह है और अपने खोजने वालों को प्रतिफल देता है।’’ (इब्रानियों 11:6) कि ‘‘वह है और था आने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है।’’ (प्रकाशित वाक्‍य 1:8) कि ‘‘हम उसी में जीवित रहते और चलते-फिरते और स्थिर रहते है।’’ (प्रेरितों के काम 17:28)बाइबिल का सबसे पहला पद (उत्‍पत्ति 1:1) स्‍पष्‍ट करता है कि आदि में परमेश्‍वर ने आकाश और पृथ्‍वी की सृष्टि की। यह मौलिक बात है और जब तक हम इस पहले पद को ग्रहण नहीं करते तो आगे बढ़ने से कोई लाभ नहीं। जब तक हम इस मौलिक बात को नहीं मानते तो हम ख्रीष्‍टयान नहीं कहलाये जा सकते। दाऊद ने अपने एक गीत (भजन संहिता 14) में गाया, ‘‘मूर्ख ने अपने मन में कहा कि परमेश्‍वर है ही नहीं’’, वास्‍तव में कम लोग हैं, जो दावा करेंगे कि परमेश्‍वर है ही नहीं, अधिक से अधिक यह कहा जाता है कि कोई महाशक्ति है लेकिन वह क्‍या है हमें नहीं मालूम। दो बातें सम्‍भावित हैं याने परमेश्‍वर है अथवा परमेश्‍वर नहीं है। यदि परमेश्‍वर है तो वह सर्वशक्तिमान सृजनहार है जिसने देखी हुई वस्‍तुओं को, अनदेखी वस्‍तुओं को बनाया है। क्‍योंकि वह सर्वशक्तिमान है हम उसके आश्‍चर्यकर्मों से चकित नहीं होते। जबकि परमेश्‍वर की इतनी शक्ति है तो यह मामूली बात है कि वह बाइबिल के द्वारा हमें अपने आपको प्रगट करता है। यदि यह सच है कि परमेश्‍वर केवल कल्‍पना है तो हम सचमुच अभाग्‍य और अनाथ हैं। यदि कोई सृजनहार परमेश्‍वर नहीं है तब यह सरांश निकलता है कि सृष्टि अपने आप बिना कोई अभिप्राय उत्‍पन्‍न हुई तथा सब धर्म और विश्‍वास बेकार हैं। यदि आपका विचार है कि परमेश्‍वर केवल कल्‍पना है तब आप मुझे मूर्ख समझेंगे और मैं आपको। परन्‍तु मरने पर यदि आपको मालूम हो जाए कि आपका विचार ग़लत था तब आपकी हानि अधिक होगी परन्‍तु यदि मेरा विचार ग़लत निकले तो फिर भी मेरी कोई हानि नहीं है। अविश्‍वासी जन शायद यह कहना चाहेगा कि उसके अविश्‍वास का यह लाभ होता है कि जो कुछ वह करना चाहता है वो करेगा परन्‍तु विश्‍वासी को परमेश्‍वर की ख़ुशी का विचार करना पड़ता है। यह बात कुछ हद तक ठीक है परन्‍तु मेरे जीवन भर का अनुभव है कि पवित्र जीवन हर समय लाभदायक है। यह स्‍पष्‍ट है कि विश्‍वासी का जीवन हमेशा सुखदायकनहीं रहता तथा किसी विश्‍वासी के धनी बनने की कम आशा है फिर भी आनन्‍द और शांति और संतोष जो विश्‍वासी को मिलते हैं वे वर्णन से बाहर हैं और पैसों से नहीं खरीदे जा सकते हैं। जब मैं सृष्टि को देखता हूं तो मेरा तर्क मुझे बतलाता है कि परमेश्‍वर जीवित है, उसके बाद मेरा अनुभव परमेश्‍वर को प्रमाणित करता है। मेरा अनुभव यह है कि 70 साल से परमेश्‍वर की सहायता और अगुवाई मेरे साथ रही तथा मेरे जीवन में अनेक ऐसी घटनाएं घटीं जिनमें यदि परमेश्‍वर की मदद न होती तो मैं बच न निकलता। अब आप खुद निर्णय कीजिये कि इन दोनों विचारों में से कौन सा विचार ठीक है। जब मैं जवान था, एक गीत गाया करता था जिसका यह मतलब था कि ‘‘संसार कहता है कि मैं कल्‍पना कर रहा हूं परन्‍तु यदि यह स्‍वप्‍न है तो मुझे जगाना नहीं।’’ आख़ि‍र ये बातें रह जाती हैं यहोवा का भय मानना बुद्धि‍ का मूल है। (नीतिवचन 1:7)और विश्‍वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्‍वर के द्वारा हुई है। (इब्रानियों 11:3) आर. हार्टर