मुझे दुःख होता है

मुद्रण

1. मुझे दुःख होता है – जब मैं देखती हूं की कलीसियाई संगति के पश्‍चात मण्‍डली के सदस्‍य तुरन्‍त घर चले जाते हैं बिना किसी से कुशल क्षेम पूछे, बिना स्‍नेह-प्रेम का आदान-प्रदान किये। जबकि वचन कहता है ‘‘एक दूसरे के प्रति प्रेम में सरगर्म रहो।’’

2. मुझे दुःख होता है – जब मैं देखती हूं कि कलीसिया की विभिन्‍न आवश्‍यकताओं के प्रति उसके सदस्‍य देख कर भी अनजान बने रहते हैं। फटे हुए पर्दे, टूटता हुआ पलस्‍तर, दरवाज़ों के उड़ते हुए रंग, याजक का पुराना वस्‍त्र क्‍यों स्‍वयं हमें नहीं कचोटते? जबकि वचन कहता है – ‘‘इस सेवा कार्य द्वारा ना केवल पवित्र लोगों की घटियां पूरी होती हैं वरन् परमेश्‍वर को बहुत धन्‍यवाद देने की भावना उमड़ती रहती है।’’ (2कुरिन्थियों 9:12)

3. मुझे दुःख होता है – जब मैं देखती हूं कि हमारे युवा सांसारिक आयोजनों में तो खूब गाते, बजाते, नाचते हैं परन्‍तु परमेश्‍वर के घर में वाद्ययंत्र सूने पड़े रहते हैं। प्रशंसा स्‍तुति निर्जीव लगती है। जबकि वचन कहता है – ‘‘यहोवा के लिए एक नया गीत गाओ।’’ (भजन संहिता 149:1) ‘‘तुरही बजाते हुए उसकी स्‍तुति करो, सारंगी और वीणा बजाते हुए उसकी स्‍तुति करो। डफ बजाते और नाचते हुए उसकी स्‍तुति करो।’’ (भजन संहिता 150:3-4)

4. मुझे दुःख होता है – जब मैं देखती हूं कि मसीही घरों में भी परमेश्‍वर का दिवस सफाई के दिन, धुलाई के दिन या फिर सांसारिक मनोरंजनों में लिप्‍त रहने के दिन के रूप में मनाया जाता है। जबकि वचन में लिखा है – ‘‘यदि तू सब्‍त के कारण अपने पैर रोके रहे अर्थात् मेरे पवित्र दिन में अपनी इच्‍छा पूरी ना करे और सब्‍त के दिन को आनन्‍द का, यहोवा के पवित्र दिन का आदरयोग्‍य दिन माने और उसका सम्‍मान करे अर्थात् अपने मार्गों में चलने, अपनी ही इच्‍छा पूरी करने तथा अपनी ही बातें बोलने से रूका रहे, तब तू यहोवा में प्रसन्‍न रहेगा, और मैं तुझे पृथ्‍वी के ऊंचे-ऊंचे स्‍थानों पर ले चलूंगा, मैं तेरे मूल पुरूष यहोवा के भाग में से तुझे खिलाऊंगा। यहोवा के मुख से ही यह वचन निकला है।’’
(यशायाह‍ 58:13-14)

अनीता जोज़फ