मृत्‍यु से संबंधित संदेश- 1 असामयिक मृत्‍यु

मुद्रण

संदर्भ :  उत्‍पत्ति‍ 3:17-19

 भूमिकाः- परिवार में हुई इस असामयिक मृत्‍यु ने जबकि हमारा प्रियजन हमसे छीन लिया है तो परमेश्‍वर के वचन के प्रकाश में हमें समझना है कि;  1. हम एक शापित संसार में रहते हैं:- सर्प के बहकावे में आकर जब आदम और हव्‍वा ने परमेश्‍वर की आज्ञा का उल्‍लंघन किया तो परमेश्‍वर ने आदम हव्‍वा को शाप दिया। ‘‘और आदम से उस ने कहा, तू ने जो अपनी पत्नि की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं मैंने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है; तू उसकी उपज जीवन भर दुःख के साथ खाया करेगाः और वह तेरे लिये कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा; और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्‍त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्‍योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और  मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।’’ (उत्‍पत्ति‍ 3:17-19)इसलिए संसार, संसार का वातावरण हमारी देह शापित है और इस शाप का परिणाम मृत्‍यु के रूप में परमेश्‍वर के द्वारा निर्धारित है।   2. संसार में घटित हर बात के लिए हम परमेश्‍वर को दोषी नहीं ठहरा सकतेः- अक्‍सर इस प्रकार की दुर्घटनाओं के समय हम परमेश्‍वर से प्रश्‍न करने लगते हैं कि ऐसा हमारे साथ क्‍यों हुआ? परन्‍तु हमें इस बात को समझना है कि हमारे या दूसरों के ग़लत परिणामों के लिए हम परमेश्‍वर को दोष नहीं दे सकते। नशे की हालत में गाड़ी चलाने के ग़लत निर्णय का परिणाम दुर्घटना हो सकता है और इसके लिए परमेश्‍वर उत्तरदायी नहीं है। गर्भवती मां के द्वारा ग़लत दवाएं खाने का परिणाम जन्‍मे बच्‍चे की अपंगता हो सकता है और इसके लिए हम परमेश्‍वर को दोषी नहीं ठहरा सकते। हमें यह समझना है कि हमारे या दूसरों के द्वारा लिए ग़लत निर्णयों के दुष्‍परिणाम परमेश्‍वर की योजना अनुसार नहीं। 

3. उम्र का मृत्‍यु से कोई संबंध नहीं हैः- उम्र की दीर्घता या अल्‍पता का मृत्‍यु से कोई संबंध नहीं है। यह निश्चित नहीं है कि कोई व्‍यक्ति एक निर्धारित आयु में ही मृत्‍यु को प्राप्‍त होगा। इसी कारण याकूब 4:14 में वचन क‍हता है ‘‘सुन तो लो तुम्‍हारा जीवन है ही क्‍या? तुम ता मानो भाप समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है फिर लोप हो जाती है।’’ 

 

इस कारण हमें यह समझना है कि उम्र का मृत्‍यु से कोई संबंध नहीं। 

4. हमें भरोसा रखना है और आज्ञाकारी बने  रहना हैः- अक्‍सर इस प्रकार की असामयिक मृत्‍यु के समय हमारे मन में यह प्रश्‍न होता है कि ऐसा हमारे साथ क्‍यों हुआ? क्‍या परमेश्‍वर ने हमको दण्‍ड दिया? क्‍या परमेश्‍वर हमसे प्रेम नहीं करता? और ऐसे समय में अक्‍सर हमारा विश्‍वास खो बैठते हैं। इसी प्रकार का प्रश्‍न मार्था ने यीशु से किया था ‘‘हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई कदापि नहीं मरता।’’(यूहन्‍ना 11:21)   हबक्‍कूक ने भी इसी प्रकार से परमेश्‍वर से प्रश्‍न किया था ‘‘हे यहोवा कब तक मैं तेरी दुहाई देता रहूंगा और तू मेरी न सुनेगा?’’(हबक्‍कूक 1:2)  

 

परन्‍तु यीशु ने कहा, ‘‘यदि तू विश्‍वास करेगी तो परमेश्‍वर की महिमा को देखेगी।’’ (यूहन्‍ना 11:40) 

 

हबक्‍कूक ने जब परमेश्‍वर पर अपना विश्‍वास बनाए रखा और उसकी आज्ञा का पालन किया तब वह परमेश्‍वर  के प्रति धन्‍यवाद से भरकर कहता है ‘‘क्‍योंकि‍ चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए और खेतों में अन्‍न न उपजे, भेड़शालाओं में भेड़-बकरियां न रहें, और न थानों में गाय बैल हों, तौभी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूंगा, और अपने उद्धारकर्त्ता परमेश्‍वर के द्वारा अति प्रसन्‍न रहूंगा।’’ (हबक्‍कूक 3:17-18)  हमें यह समझना है कि हमारे जीवन की त्रासदी को परमेश्‍वर अपनी योजना को पूर्ण करने का माध्‍यम बनाता  है। चेलों ने जब एक जन्म के अन्‍धे को देखकर यीशु से पूछा ‘‘हे रब्‍बी, किसने पाप किया था कि यह अन्‍धा जन्‍मा, इस मनुष्‍य ने, या उसके माता पिता ने? यीशु ने उत्तर दिया, कि न तो इसने पाप किया था; न इसके माता पिता नेः परन्‍तु यह इसलिए हुआ, कि परमेश्‍वर के काम उसमें प्रकट हों।’’ (यूहन्‍ना 9:2,3)   लाजर की बीमारी और मृत्‍यु भी परमेश्‍वर की योजना का माध्‍यम थी ताकि उसके द्वारा परमेश्‍वर को महिमा मिले। दमोह में प्‍लेग की भयानक बीमारी परमेश्‍वर योजना का माध्‍यम बनी कि जो बच्‍चे उस बीमारी में अनाथ होकर बच जाएं, उनके द्वारा से मसीही कलीसिया की नींव पड़े।  निष्‍कर्षः- हम इन कठिन पलों में इस बात को समझे कि;- हम एक शापित संसार में रहते हैं।- संसार में घटित हर बात के लिए हम परमेश्‍वर को दोषी नहीं ठहरा सकते। - हम्र का मृत्‍यु से कोई संबंध नहीं। - हमें भरोसा रखना और आज्ञाकारी होना है। इस कारण से हमें सदैव तैयार रहना है, इस संसार में रहते हुए अपनी आत्‍मा की तैयारी करना है कि चाहे कभी भी मृत्‍यु आए तो हम तैयार हों कि अपनी आत्‍मा परमेश्‍वर के सुरक्षित हाथों में सौंप सकें।